Showing posts with label मनोरंजन. Show all posts
Showing posts with label मनोरंजन. Show all posts

Saturday, March 12, 2011

माधवगढ राष्ट्रीय उद्यान शिवपुरी की यात्रा

हर महीने के पहले सप्ताहांत में घुमने के लिए शहर से बाहर जाने का नियम सा बन गया है.  इससे पिछली बार रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान गया था और उससे पहले माउन्ट आबू.   इस बार काफी सोचने के बाद भी मुझे व् मेरे मित्र राजा को कोई घुमने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं मिल रहा था. (राजा तथा मैं दोनों ही घुमने निकलते हैं)

काफी सोच विचार के बाद हम दोनों मध्यप्रदेश के शिवपुरी के पास स्थित माधव नेशनल पार्क जाने का मन बनाया. इंटरनेट पर खोज करने पर ज्ञात हुआ की यह जगह हिरनों तथा टाइगर के लिए मशहूर है.

बस फिर क्या था, गूगल मैप्स से कोटा से माधव नेशनल पार्क जाने के रास्ते का प्रिंट निकाला, दोनों ने अपना अपना बेग उठाया कार स्टार्ट की और चल पड़े अपनी मंजिल की ओर.



दिन में तीन बजे निकले थे ओर बारां पहुँचते पहुँचते ही शाम हो गयी, अभी भी शिवपुरी वहां से १२५ किलोमीटर आगे था.  रात को शाहबाद के पास एक ढाबे पर गाड़ी रोकी ओर खाना खाया. चारपाई देखकर लेटने का मन किया, ओर लेट गए. काफी सालों बाद ढाबे की चारपाई पर सोया.




थोड़ी ही देर में मच्छर खाने लगे, गाड़ी के अन्दर सोने भागे. थोड़ी देर सुस्ताने के बाद मैंने राजा को सलाह दी की अब चलते है, रात को शिवपुरी पहुँच कर होटल कर लेते हैं. ओर फिर हम शिवपुरी के लिए रवाना हो गए. रात को दो बजे जाकर शिवपुरी के होटल में पहुंचे.

सुबह सुबह जंगल की ओर प्रस्थान किया, जानकर अच्छा लगा की जंगल में कार भी जा सकती है, लेकिन साथ में गाइड लेकर जाना पड़ेगा.   अब भैया हुआ क्या की शिवपुरी वालो को अतने मशहूर जगह का पता नहीं की कहाँ से जाया जाता है

आखिर कार काफी पुछाताछी करने के बाद मुख्य द्वार तक पहुंचे




फीस जमा करायी गाइड साथ में लिया ओर जा पहुंचे जंगल के अन्दर, अन्दर एक ओर बार चेकिंग हुई,

नीचे के चित्र में जंगल में बना हुआ रेसोर्ट




इसी जंगल के आरम्भ में सिंधिया द्वारा बनवाया हुआ बांध है जो की बरसाती पानी को एकत्रित करके रखता है, पूरा शिवपुरी इसका पानी पीता है.   ओर इसी के बराबर से जंगल में जाने का रास्ता है जिस पर मेरी कार जा रही है




इसी जगह का एक विडियो



जंगल में घूमते हुए मैं, राजा ओर हमारा गाइड राजेश कुमार






नीचे दिए गए चित्र में है शिकार बक्सा, यहाँ ऊपर से बकरा लटका कर सिंधिया शेर  का इंतज़ार करते थे, जब वो आता था तो वो उसका शिकार करते थे, अकेले उन्होंने सात सो शेर मार गिराए. इस जंगल में अब शेर नहीं हैं





इस जगह का विडियो



जंगल में हमें मादा सांभर का समूह मिला



थोडा बहुत ओर आगे बड़े तो हिरनों का परिवार मिला.  हिरन एक बार तो हमें देखकर सहम गए, लेकिन उसके बाद एक के बाद एक ने कार के आगे दोड़कर मार्ग के दूसरी ओर चले गए



जंगल में घुमने का मज़ा ही कुछ ओर है. इसी जंगल में पहाड़ी पर एक किला मोजूद है,   इसका नाम है  Geroge castle, इसका निर्माण जीवाजी राव सिंधिया ने इंग्लैंड के राजा जोर्ज पंचम के लिए करवाया था, वो यहाँ आकर शेर का शिकार करने आने वाले थे, वो यहाँ ठहरते, परन्तु उन्होंने रास्ते में शेर का शिकार कर लिया और यहाँ आये ही नहीं,
यहाँ आज हम आगये









यहाँ के कुछ विडियो, आओ किले के अन्दर चले





इसके बाद काफी देर तक जंगल में भ्रमण किया ओर जंगल के बाहर आगये. बाहर हनुमान जी का भव्य मंदिर है यहाँ आकर प्रभु के दर्शन किये.



ओर होटल जाकर वापस कोटा के लिए प्रस्थान किया.....

अगर आप भी यहाँ जाना चाहे तो जा सल्कते हैं.  बहुत अच्छी जगह है.. शिवपुरी में पुराने बस स्टैंड के पास बने होटलों में ठहरा जा सकता है. जंगल में घुमने का सबसे सही समय है प्रातः ६ बजे का क्यूंकि इसी समय सारे जानवर ज्यादा दिखाई देते हैं

अगले माह फिर कहीं ओर ओर उसका वृतांत यहाँ .......

Tuesday, December 28, 2010

2010 की यादें - सर्वश्रेष्ठ धमाके

2010 ख़त्म होने को है,
.
वक़्त आ गया है इस गुजर जाने वाले साल को याद करने का.
.
तो याद करते है इस साल को
.
सबसे पहले पहली किश्त में पेश है

.

2010 के

सर्वश्रेष्ठ धमाके




अगली पोस्ट में 2010 का कुछ और

Sunday, April 11, 2010

रावण अब 18 जून को

निर्माता निर्देशक मणिरत्नम की बहुप्रतीक्षित रावण आखिर 18 जून को प्रदर्शित होने जा रही है.
पिछले दो साल से बन रही इस फिल्म में मुख्य भूमिका अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, विक्रम, गोविंदा, पृथ्वीराज निभा रहे हैं. यह फिल्म एक साथ हिंदी और तमिल भाषा में बन रही है, तमिल भाषा वाला वर्जन तेलगु में डब किया जायेगा. हिंदी वाली फिल्म में विक्रम खलनायक की भूमिका में दिखाई देगा. तमिल और तेलगु वाली भाषा में यह रोल पृथ्वीराज करेंगे.
अभिषेक रावण का, ऐश्वर्या सीता और गोविंदा हनुमान (Forest Officer) का अभिनय कर रहे हैं तथा गोविंदा जो की हनुमान(Forest officer) हैं अपराधी की तलाश में राम की सहायता करते हैं
फिल्म की कहानी The great epic रामायण से ली गयी है
रावण तीनो भाषाओँ में एक साथ प्रदर्शित होने जा रही है .

Friday, January 29, 2010

चमकू चमकू छोटा तारा

मेरी बेटी की कविता

चमकू चमकू छोटा तारा
देखो कितना गजब का तारा
इस दुनिया में सबसे ऊँचा
हीरे जैसा प्यारा तारा

जेक्वा और जिलवा
गए ऊपर हिलवा
पनिया भरण के वास्ते
पनिया भरण के वास्ते
जक्वा गिर गवा
उसका माथा फट गवा
जक्वा गिर गवा
उसका माथा फट गवा
जिलवा आये लुढकन पुरे रास्ते

Wednesday, January 27, 2010

नए मिले सुर मेरा तुम्हारा में वो बात नहीं

२६ जनवरी को मिले सुर मेरा तुम्हारा का पुनः निर्माण फिर मिले सुर देखा बहुत अच्छा लगा देखकर. बचपन याद आगया. जिस तरह फिल्मों के गाने जुबान पर रहते है उसी तरह ये गाना था . पूरा गाना कंटस्थ याद था. गाने में कई भाषाओं का समावेश किया गया था लेकिन उन भाषाओँ का ज्ञान न होते हुए भी पूरा गाना याद रहता था . सोलह मिनट का गाना हर बार बैठकर देखते थे.

 अब बीस सालों बाद उसका दोबारा निर्माण हुआ बहुत अच्छा लगा. लेकिन उसमे वो बात नहीं. मैं नए गाने की बुराई नहीं कर रहा हूँ. मुझे गाना बहुत अच्छा लगा है . नए कलाकारों और सितारों के साथ गाना खूब अच्छा बन पड़ा है. नए सितारे खूब फब भी रहे हैं. लेकिन पता नहीं क्या बात है जिस तरह उस गाने को सुनकर देखकर जो ख़ुशी महसूस  होती थी वो इस बार नहीं हुई, मन को उस तरह छू नहीं पाया नया गाना.
फिर भी गाना अच्छा बना है
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा 



Monday, October 26, 2009

राजू भइया बहुत सीधे हैं

बिग बोस के घर में राजू भइया इतने शरीफ नजर आ रहे हैं की क्या कहना। शराफत तो बस टपक टपक कर दिख रही है। कोई उनको आंख दिखावा है तो हँस जाते हैं , चुपचाप गाली सुन लेते हैं, हँसा हँसा के सबका मनोरंजन करते रहते हैं, लेकिन भैया अगर कोई ज्यादा बकवास करे तो उसको सेम टू यू भी कह देते हैं जैसे की कमाल खान को बड़े प्रेम से माँ बहन की गाली के जवाब में सेम टू यू सेम टू यू कर रहे थे।
वाह राजू भैया वाह मान गये तुम्हे कमाल जैसे मजबूत और चतुर खिलाड़ी को घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया। भई ये तो वही बात हुई ना की हमारे राजू भैया सरदार हैं सबके।
इसी बात पर हम युगल मेहरा एक बात का वचन लेते हैं की "राजू भैया जब भी आप नामांकन में आएँगे हम कम से कम सौ रुपया का एस एम एस जरूर करेंगे।
आशा है की आप बिग बास जीतकर अपने पंखो (फेन्स) का नाम रौशन करेंगे।

Saturday, June 03, 2006

क्या आत्मा अजर अमर है?

आत्मा अजर अमर होती है। शरीर नाशवान है वह मरता है परन्तु आत्मा कभी नहीं मरती है। यही हमें बचपन से ही सिखाया जाता है।
आत्माएं शरीर बदलती रहती है। आत्माओं के लिये शरीर मात्र एक किराए के मकान की तरह होता है। जब वे इसे छोडती हैं तो शरीर

को मृत मान लिया जाता है।
इसका मतलब हम आत्माए हैं जो इस शरीर में रह रहै है। किसी दिन हम इस शरीर को छोड देंगे।
लेकिन जब सभी जानते हैं कि आत्माएं नहीं मरती तो फिर किसी के मरने पर इतना रोना धोना क्यों होता है।
दुनिया की जनसंख्या क्यों बढ रही है?
यह बात भी आश्यर्य की है कि दुनिया की जनसंख्या क्यों बढ रही है जबकी आत्मा तो अजर अमर है। आत्माएं शरीर बदलती है इससे

मानव का जीवन मृत्यु का खेल चलता है, तो इस नियम के अनुसार तो जनसंख्या नहीं बढनी चाहीये न। क्योंकी जो मर रहा है वो

कुछ दिनों बाद फिर जन्म ले रहा है, तो फिर इतनी पापूलेशन कैसे बढी।
हम भारतीय 35 करोड से एक अरब कैसे होगये?
क्या नई नई आत्माएं जन्म ले रही है?
उदाहरण के तोर पर भारत देश में 1940 के समय लगभग 35करोड की जनसंख्या थी। इसका मतलब 35करोड आत्माएं 35करोड

शरीरों में रह रही थी। तो फिर ये जनसंख्या उत्तरोत्तर आगे कैसे बडती गई। तो क्या लगातार आत्माएं भी जन्म ले रही थी?
ये बात मेरी समझ से परे है
क्या आत्माएं भी आपस में शादी करके बच्चे पैदा कर रही है?
तभी तो एक अरब आत्माएं हो गई है।
इसका मतलब सरकार को आबादी नियंत्रण के ये जनता को समझाने कि बजाय आत्माएं को समझाना चाहिये कि वो आत्माएं पैदा न

करें। बैचारे शरीर फालतु ही बदनाम हो रहै हैं जनसंख्या वृद्धी के लिये।

Thursday, May 18, 2006

ऐसा भी होता है

कभी कभी एसा होता है कि मन करता है कि चिठ्ठे पर कुछ लिखा जाए और कुछ सूझता नहीं, ऐसा मेरे साथ ही नहीं सबके साथ होता होगा। हम सभी के साथ कभी न कभी ऐसा वक्त आता है जब हम लिखना चाहते हैं और यह तक नहीं सोच पाते कि विषय क्या होना चाहिये। और जब विषय ही नहीं हो तो लिखें क्या खाक। विषय ढूढंने के लिये समाचार पत्र देखतें हैं या टीवी। फिर भी विषय तलाशने में असफल होते हैं। ऐसे में क्या करे चिठ्ठाकार।
क्या लिखे वो?
आज मेरे साथ यही समस्या हुई। लिखने की इच्छा हुई और विषय नहीं ढूंढ पाया कि किस पर लिखा जाए।
तब मुझे एक आईडीया आया।
मैने सोचा कि जब कुछ नहीं आरहा तो क्यो न दुसरों के चिठ्ठे पढूं।
और जब चिठ्ठे पढे तो सोचा कि क्यों न इसी विषय पर लिख दुं कि विषय नहीं मिल रहा है।
और ठोक दी यह पोस्ट।
अब किसी को इसे पढकर मजा आये न आये, मुझे तो लिखने में बहूत मजा आया।
झेलो भई झेलो
हा हा हा

Monday, May 08, 2006

खतरनाक बुढ्ढा Part Two (बुढ्ढों से सावधान) Harmful Oldman

आखिरकार हम अपनी हंसी को दबा नहीं पाये और सारे जोर जोर से हंसने लगे। बुढ्ढा भी अचकचाता हुआ नींद से जागने का नाटक करते हुए उठा।
उसने हमारी तरफ देखा, हम उसकी तरफ देखकर हंस रहै थे। तभी उसने आगे वाली सीट पर देखा तो पाया कि आगे तो लडका बैठा है। बेचारा बडा शर्मिंदा हुआ।
कोटा पहुंचने पर मैं लडकी के पास गया ओर मैने कहा कि क्या ये बुढउ तुम्हे परेशान कर रहा था तो उसने हामी में सर हिला दिया।
मैने उससे कहा कि जब हम कह रहै थे कि कोई परेशान कर रहा है तो फिर क्यों जवाब नहीं दिया। तो वो कुछ नहीं बोली। मैने उससे कहा कि "तुमने कुत्तों से सावधान" सुना होगा, अब नया सुनो बुढ्ढों से सावधान।
लडकी से मैने कहा कि यदी यही छेडखानी कोई लडका कर रहा होता तो तुम अभी तक उसके जूते पडवा देती फिर तुमने उसे क्यों बख्शा। लडकी निरुत्तर रही।
मैने आखिर उससे कहा कि अच्छा चलते हैं।
और मैं घर आगया अच्छी अच्छी यादें लिये।
 

Sunday, May 07, 2006

खतरनाक बुढ्ढा (बुढ्ढों से सावधान) Harmful Oldman

दोस्तों यदी किसी ने इससे पुर्व के पोस्ट पढे हों तो उन्हे याद ही होगा किस प्रकार मेरी कोटा से रोहतक की यात्रा रही तथा किस प्रकार वहां पर बारात में मेरे साथ वो अजीबोगरीब घटना घटी।
अब आगे का हाल
जैसा कि टाईटल से लग रहा है इसमें किसी बुढ्ढे का जिक्र होगा। सच में ये एक बुढ्ढे की ही दास्तान है।
कोटा जाने के लिये हमने दोबारा उसी जनशताब्दी एक्सप्रेस को चुना। जाते समय हम चार मित्र थे। गाडी हजरतनिजामुद्दिन से कोटा के लिये रवाना हुई। जिसने भी इस गाडी में सफर किया हो उसे याद होगा कि इस गाडी में बैठने की व्यवस्था बस की भांति होती है। यानी तीन सीटें इधर और तीन उधर। हम चारों में से तीनों तो साथ बैठ गये और एक पास वाली पर बैठ गया। हमारे पास सोनी का केमकोर्डर था।
हमारे आगे वाली सीट पर दो बुजुर्ग महिलाएं तथा उनके साथ एक बुजुर्ग व्यक्ति था। उनकी बातों से हमें पता चला कि दोनो महिलाओं में से एक तो उस आदमी की पत्नी थी तथा एक बहन।
यही था वो खतरनाक बुढ्ढा
इस व्यक्ति की आयु 65 के आसपास होगी। मगर इसका दिल जवान था इसका सबूत उसने थोडी देर बाद दिया। जैसे ही ट्रेन ने अपनी गती पकडी बुढ्ढे ने अपनी सीट छोड दी तथा बाजु वाली दुसरी सीट पर बैठ गया।
उसके आगे वाली सीट पर एक लडकी बैठी हूई थी जो रिलायंस के मोबाईल से खेल रही थी। हमारा एक मित्र बडी आरजू से उसको निहार रहा था पर वो थी कि पलटने का नाम ही नहीं ले रहीं थी।
मेरा दोस्त कमेंट कर रहा था कि रिलायंस तो बैकार नेटवर्क है हमारे पास तो एअरटेल है।
तभी एक अजीब घटना घटित हूई।
हम सब ने नोट किया।
हम क्या देखते हैं कि बुढ्ढे ने आगे वाली सीट की पुश्त पर सिर टिका लिया ओर सोने लगा था मगर उसका हाथ सीट की पुश्त के भी आगे जा रहा था।
लडकी के शरीर से मात्र कुछ ही दूरी पर था उसका हाथ।
हमने एक दुसरे की और देखा फिर सोचा कि ऐसे ही चला गया होगा बुढ्ढे का हाथ। नींद में होगा।
तभी हमने एक हरकत और देखी हमने देखा कि बुढ्ढे ने अपना हाथ एक इंच और आगे बडा दिया था और उसकी उंगलियां लडकी की पीठ को छूने लगी थी।
हमारा दिमाग खराब हो गया।
हमें बुढ्ढे पे गुस्सा आने लगा। गुस्सा आने का कारण नहीं बताउंगा बस गुस्सा आने लगा।
बुढ्ढे ने धीरे धीरे करके अपनी सारी उंगलिंया लडकी के सटा दी, और उन उंगलियों को गडाने लगा। हमने सोचा कि इस लडकी को पता नहीं चल रहा है क्या इसकी हरकतों का।
तभी मेरे दोस्त ने कमेंट पास किया कि "यदी कोई रिलायंस पे मिस्डकाल मार रहा हो तो बेहीचक एअरटेल को समस्या बताई जा सकती है एअर टेल समस्या का निदान करेगी।"
मगर लडकी की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। हमने फिर कमेंट किया "लगता है लडकी को ही मजा आरहा है"
वास्तव में हम चाहते थे कि वो लडकी हमसे कहे और हम बुढ्ढे को सबक सिखा दें परन्तु जब तक लडकी नहीं कहती अपन कायको चलता सेंटर में लें।
बुढ्ढा सारी बातों से बेखबर अपना काम किये जारहा था। मैने भी सोचा कि उंगलिया अडाके ही खुश हो रहा है साला।
एक बुजुर्ग तो वो होता है कि जिसके सफेद बाल देखते ही हम उसकी ईज्जत करते हैं और एक ये साहब थे जिन पर हमें क्रोध आरहा था।
तभी हमने देखा कि बुढ्ढे की उंगलियों से परेशान होकर लडकी दायीं ओर सरक गयी थी, बुढ्ढे को पता नहीं चला वो हवा में ही अपनी
उंगलियां चलाता रहा। तभी बुढ्ढे ने अपनी आंखे खोली और अपनी सीट से खडा होगया तथा हमें घूरने लगा। उसने जेब में हाथ डाला और प्लास्टिक की छोटी सी शीशी निकाली, हाथ में उडेली तो उसमें से छोटी छोटी गोलियां निकली। तीन चार गोलियां उसने मुंह के हवाले करदी। और उसके बाद साहब बाथरुम को रवाना होगये।

करीब दस मिनट के बाद वापस आये और मोर्चा संभाल लिया।
बुढ्ढे ने देखा कि लडकी दायीं ओर खिसक गई है तो उसने अपना हाथ दो सीट के बीच वाली जगह पर फंसा दिया और फिर से लडकी को छूने लगा।
हमने सोचा कि इस बार तो बुढ्ढा पिटा, अभी लडकी चिल्लाएगी ओर फिर बुढ्ढे का क्या होगा भगवान ही मालिक है।
लेकिन आश्चर्य लडकी ने कुछ भी नहीं कहा। हमने चाय बेचने वाले की तरह आवाज लगाई कि क्या किसी को मदद चाहिये। परन्तु लडकी ने कोई मदद नहीं मांगी। बेचारी लडकी फिर से बांयी ओर खिसक गई तो बुढ्ढा फिर से बांयी ओर से हाथ चलाने लगा। मैने सोचा कि लडकी शायद घबरा रही है। आखिर कार लडकी आगे की ओर झुककर बैठ गई। अब फिर से बुढ्ढे का हाथ हवा में था। उसकी उंगलिया लडकी के शरीर को खोज रही थी, और हम उसकी उंगलियों की हरकतों को देखकर क्रोध में उबल रहै थे।
बुढ्ढा परेशान हो गया क्योंकी लडकी आगे झुककर बैठ गई थी। बुढ्ढा व्यग्र हो रहा था। कि तभी वेटर आया लडकी ने खाने के लिये कुछ खरीदा और भूलवश फिर से पीछे टिककर बेठ गई। बुढ्ढे की फिर से चारों उंगलिया घी में और सर कढाई में होगया। यानी बुढ्ढा फिर से शुरु होगया।
अब हम केमरे से उसके हाथ की फिल्म उतारने लगे।
लडकी फिर से परेशान होने लगी, हमसे मदद भी नहीं ले रही थी। वो कभी दायें होती कभी बायें और बुढ्ढे मिंया भी। गजब का नींद का नाटक कर रहा था बुढ्ढा।
जैसे ही कोई रेल्वे स्टेशन आता उठ जाता और गाडी रवाना होते ही झट से सोजाता ओर फिर काम चालु।
आखिरकार
लडकी ने पास बैठे लडके से कुछ कहा।
हमने सोचा कि अब तो बुढ्ढा गया,
लेकिन हुआ कुछ और ही था। लडका अपनी सीट से खडा हूआ ओर लडकी भी तथा दोनो ने आपस में सीटें बदल ली।
मजे वाली बात ये थी कि बुढ्ढे को इस बात का पता नहीं चला। बुढ्ढा अपना हाथ चलाता रहा। अब बुढ्ढे को क्या पता कि लडकी उस जगह लडके को बैठा गई है।
आगे का पुर्वानुमान लगालगा कर हम लोटपोट हुए जा रहै थे। हम सोच सोच कर कहकहे लगा रहे थे कि अब बुढ्ढा अनजाने में लडके के उंगला करेगा।
कसम से हंस हंस के मेरा तो बुरा हाल हो गया। मेरा एक दोस्त पेट पकड पक़ड के हंस रहा था।
तभी मैने हंसते हूए कहा कि चुप रहो चुप रहो देखो कैसा मजा आता है।
बैचारा लडका
उसे क्या पता था कि लडकी उसे कहां बैठा गई है।
तभी बुढ्ढे ने अपनी उंगलीयां आगे बडाई हम अपनी हंसी रोकने के लिये जबडा भींच कर बैठ गये। बुढ्ढे ने उंगलियां और आगे बडाई ओर एक उंगली अडा दी।
लडके ने गोर नहीं किया। वो और पीछे सट कर बैठ गया।
बुढ्ढे ने अपनी उंगलिया और गडाई। तभी लडके ने पलट कर देखा। उसने बुढ्ढे का हाथ देखा, फिर हमें देखा कि हम किस प्रकार हंसी को दबा रहै थे। बुढ्ढे ने नींद का नाटक करते हुए और जोर से उंगलिया गडाई लडके ने उसके हाथ को फिर से देखा फिर हमें देखा। बेचारे को काटो तो खुन नहीं, समझ गया कि लडकी के साथ क्या हो रहा होगा।


शेष फिर...........


.
.
.
..
जार कहानी बीच में कूँ छोड़ देते हो? और Harmfull Oldman नहीं Harmful Oldman होत है।
लेखक रजनीश मंगला, यहाँ monday, may 08, 2006 4:03:00 am

Friday, April 28, 2006

वो रहस्यमयी कोन था ??? (My Journey)

कोटा से दिल्ली ट्रेन यात्रा तथा दिल्ली के बाद रोहतक और वहां पर शादी।
कसम से मजा आगया हरियाणा में भी शादी का, वैसे यहां उतने कार्यक्रम नहीं होते हैं जितने कि हमारे राजस्थान में होते हैं परन्तु हरियाणा की बात ही कुछ और है। रोहतक के पास एक गांव है कबूलपुर बस वहीं से रवाना होनी थी बारात।
अब बारात रवाना हूई तो समाचना पहूंची। यहां हम खूब नाचे। एक बात मैने नोट की वो ये थी कि यहां पर वर वधू के फेरों की रस्म दिन में ही हो जाती है जबकी राजस्थान में तो ये मध्यरात्री का कार्यक्रम है।
खेर शाम को मेरे एक मित्र संजीव ने कहा कि उसे शोच जाना है। वो भी कोटा से ही वहां पर गया था। मैने उससे कहा कि चल भई मैं भी फ्रेश हो लूंगा। अब गांव में तो शोच खुले आकाश के नीचे ही जाना पडता है। हम तीनो यानी की मैं, मुकेश तथा संजीव तीनों उचित स्थान की तलाश करने लगे।
हमने एक बुजुर्ग ग्रामीण से पुछा कि "कहां जाएं?"
तो उस बुजुर्ग ने हमें एक तालाब की तरफ का रास्ता बताया। ये जगह गांव से जरा बाहर थी। हमने कहा चलते है।
धूल का गुबार
मैने कहा "यार ये हवा में इतनी धूल क्यों हो रही है?"
हम चक्कर में पड गये कि ये इतनी धूल कैसे हो रही थी क्योंकि उस समय हवा एकदम शान्त थी। खेर हम इसी रास्ते पर आगे बडते गये। थोडा और चले तो देखा कि वहां पर गायों का रैला लगा हूआ था। कम से कम तीन चार हजार गायें थी वहां, और सारी धूल में मस्ती कर रहीं थी, अब मुझे हवा में इतनी धूल होने का कारण तो समझ में आगया था लेकिन इतनी सारी गायें एक साथ देखकर चकरा गया था। मैने जिन्दगी में इतनी गायें एक साथ नहीं देखी थी।
संजीव ने लाल रंग की शर्ट पहन रखी थी और अभी उजाला भी फैला हूआथा इसलिये मैने उससे शर्ट उतारने को कहा क्योंकि हो सकता है इन गायों में कोई सांड भी हो।
हम वहां से आगे बडे तो हमें एक मंदिर नजर आया। काफी विशाल मंदिर था। एक गांव वाला सामने से आरहा था मैने उससे पूछा कि ये किसका मंदिर है तो उसने बताया की हनुमान जी का है।
बदंरो का मेला
जिस तरह हमने गायें ही गायें देखी थी, अब हमें बंदर ही बंदर नजर आ रहै थे। असंख्य बंदर थे वहां, मुझे लग रहा थे कि जैसे मैं एलिस इन वंडरलेंड में हूँ। उन बंदरो से बचते हुए हम और आगे बडे तो मंदिर तक पहुंच गये। वहां पर एक विशाल तालाब था। लेकिन मैने सोचा कि हम यहां मदिंर के पास शोच नहीं कर सकते। मैने किसी से पुछा कि शोच के लिये कहां जाए? उस आदमी ने एक तरफ जाने को कहा उस तरफ वृक्षों कि बाड सी आ रही थी। उस आदमी ने बताया कि इन पेडों के बीच में एक पगडंडी जा रही है। तथा इस पगडंडी के जरीये इन पेडों की श्रंखला पार करने के बाद एक और तालाब आएगा, आप वहीं शोच कर लिजिएगा।
हमने जब इस वृक्ष श्रंखला को देखा तो लगता ही नहीं था कि इसके पार कोई तालाब होगा, ऐसा लगता था मानो मीलों लम्बा जंगल होगा।
संजीव का प्रेशर बढने लगा था। हमने पेडों में पगडंडी देखी और चल पडे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी गुफा में चल रहै हों। तभी हम क्या देखते हैं कि सामने से एक नाटा सा तथा मोटा सा आदमी मस्त चाल से हमारी दिशा में आ रहा था। वो आदमी करीब साडे तीन फीट का होगा और मोटाई में अमजद खान की तरह था। उसके पीछे बाडीगार्ड की तरह दो आदमी चल रहे थे। जैसे ही वे हमारे नजदीक आये हम जरा साईड में हट गये। वे हमें देखे बिना चले गये। उन्होने हम पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। मुझे ये बात बडी अटपटी सी लगी।
खैर हम जरा सा आगे बडे तो देखा कि सामने खुला मैदान था। वृक्षों की श्रंखला समाप्त हो गई थी। लम्बा चौडा मैदान और उस पर लगी हरी हरी घास अत्यंत सुंदर लग रही थी।
लेकिन एक बात थी।
वो बात ये थी कि वहां पर तालाब नहीं था। हमने चारों तरफ नजरें दोडाई लेकिन कोई तालाब न
जर नही आया। पानी के नाम पर छोटे छोटे पोखर बने हुए थे। हमने फेसला किया कि इन पोखरों के पानी का ही इस्तेमान कर लेंगे।
हम तीनों ने अपनी अपनी पोजीशन संभाल ली।
उस वक्त मैने एक आदमी को देखा, यही वो रहस्यमयी आदमी था जिसका कि टाइटल में जिक्र हुआ है, मैने देखा कि उस आदमी ने एकदम सफेद रंग का कुर्ता पायजामा पहन रखा था। और वो आलथी पालथी मार कर बैठा हुआ था जहां वो बेठा हुआ था वहां पर कीचड था।
मैने अपने दोस्तों को उसे दिखाया, उन्होने भी उसे देखा। उस आदमी की पीठ हमारी तरफ थी, और वो एकदम योगमुद्रा में बेठा हूआ था। हमने फैसला किया कि निवृत होने के बाद उस आदमी के पास चलेंगे।
वह आदमी हम से करीब दो ढाई सौ फीट की दूरी पर बैठा था।
हम अपने कार्य से फारिंम हुए और पोखर के पानी से काम चलाया।
तभी मैने एक और चीज पर गौर किया, मैने संजीव से कहा "यार! तुझे नहीं लगता कि इस आदमी के हाथ आवश्यकता से अधिक लम्बे हैं।"3
तो उसने मजाक में हंसते हुए जवाब दिया "हां हमें पास जाकर देखना चाहिये कि कहीं उसके पैर भी तो उल्टे नहीं है"
इस बात पर हम सभी ने जोर से ठहाका लगाया।
फिर हम उस व्यक्ति कि लम्बाई का अनुमान लगाने लगे तो हमें लगा कि इस बात पर हमारा ध्यान पहले क्यो नहीं गया।
वो आदमी हमसे दूर जरूर था लेकिन यकीनन बैठे हुए में उसकी लम्बाई 6 फीट लग रही थी, हमने सोचा कि ये खडा होगा तो कितना लम्बा होगा।
हम लोग चिल्ला चिल्ला कर बातें कर रहै थे लेकिन कमाल की बात थी कि वो आदमी टस से मस नहीं हो रहा था। हम उसके काफी करीब जा चुके थे और उस आदमी ने एक बार भी पलट कर नहीं देखा था।
फिर न जाने हमें एकदम से क्या हुआ हम वापस जाने की बातें करने लगे एकदम उस आदमी के पीछे खडे होकर, और हमने वापस आने का रास्ता पकड लिया क्योंकि अंधेरा सा होने लगा था।
और हम धीरे धिरे वहां आगये जहां बारात ठहराई गई थी।
जब ये बात हमने वहां के रहने वाले लोगों को बताई तो किसी ने विश्वास ही नहीं किया, सब कह रहे थे कि उस तरफ वैसे तो कोई जाता नहीं और अगर चला भी गया तो कोई आलथी पालथी मारकर नहीं बेठेगा। और हां उसकी लम्बाई के और हाथों की लम्बाई के बारें में भी किसी ने विश्वास नहीं किया।
और जिसने विश्वास किया उसने यही कहा कि आपकी किस्मत अच्छी थी जो आप वहां से बच कर आगये।

Friday, March 24, 2006

मैं क्यों करूं SMS

अरे कोई एसा बन्दा है क्या! जो मुझे समझा सके कि ये SMS क्यों किया जाता है, क्या मिलता है हमें SMS करके?मेरे ख्याल से SMS की पूरी व्याख्या है Short Message Service अर्थात लघु संदेश सेवा, अर्थात ऐसा संदेश जो छोटा हो तथा बात को समझा सके। तो इसका मतलब ये हुआ कि जब किसी को छोटा सा संदेश भेजना हो तो इस सेवा का सहारा लिया जाए।
अरे भाई पका नहीं रहा हूँ आपको।
मैं भी SMS करता हूँ, परंतु मैं उन ही लोगों को SMS करता हूँ जो मेरे परिचित हों या फिर मुझे किसी से काम हो, अथवा किसी त्योहार या पर्व पर शुभकामना भेजनी हो। आप भी ये करते होंगे, मगर दोस्तों प्रश्न यह है कि मैं उन लोगों को SMS क्यों करूं जिनको मैं जानता भी नहीं, जो वक्त पडने पर मेरे काम भी नहीं आने वाले, तो मैं अपने SMS उन पर क्यों बर्बाद करूं।
इन्डियन आईडल, सारेगामापा, लाफ्टर चेम्पीयन इत्यादी जैसे कई कार्यक्रम अपने प्रतियोगीयों को जिताने के लिये हमें SMS करने कि कहते हैं। जैसे तो किसी अपने को जिताने की दुहाई दे रहै हों, इनके बोलने का अंदाज भी निराला होता है जैसे -- अपने पसंदीदा प्रतियोगी को जिताइये फलाने नं पर SMS करिये। SMS का रेट 3रू, 2रू, 6रू आदि।
लाखों लोग SMS करते हैं पैसे बर्बाद करते हैं, मत करो यारों, ये कोई अपने काम नहीं आने वाला, यदी नहीं मानते तो आज ही 10,000रू के SMS करो और देखो कि कोई पूछने भी आता है क्या। यदी नहीं आता तो फिर SMS क्यों किया जाय।
क्यों दोस्तो इन फालतु लोगों को SMS करना बैकार है ना!
और अगर अब भी कोई नहीं सुधरता है तो करो फिर अपने बाप का क्या जाता है।